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| स्वतंत्र भारत में आध्यात्मिक एवं नैतिक क्रांति के प्रणेता थे जयप्रकाश नारायण : प्रो. विभु कुमार |
छपरा । लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 124वीं जयंती के अवसर पर जयप्रकाश अध्ययन केंद्र, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा के तत्वावधान में एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य लोकनायक जयप्रकाश नारायण के विचारों, उनके राजनीतिक दर्शन, नैतिक मूल्यों तथा भारतीय लोकतंत्र के निर्माण में उनके योगदान को स्मरण करना और वर्तमान संदर्भ में उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित करना था।
कार्यक्रम का शुभारंभ जयप्रकाश विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. परमेंद्र कुमार बाजपेयी द्वारा लोकनायक जयप्रकाश नारायण की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ हुआ। इसके पश्चात कुलपति महोदय ने जयप्रकाश अध्ययन केंद्र में स्थापित लोकनायक के तैलचित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
आध्यात्मिक एवं नैतिक क्रांति के प्रणेता थे जयप्रकाश नारायण : प्रो. विभु कुमार
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो. विभु कुमार, पूर्व अध्यक्ष, राजनीति विज्ञान विभाग, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा ने अपने व्याख्यान में कहा कि जयप्रकाश नारायण स्वतंत्र भारत में आध्यात्मिक और नैतिक क्रांति के प्रणेता थे। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व भारतीय राजनीति में सत्ता-केंद्रित राजनीति से ऊपर उठकर जनकल्याण, नैतिकता और सामाजिक परिवर्तन की स्थापना का प्रेरणास्रोत है। उन्होंने कहा कि जयप्रकाश नारायण भारतीय राजनीति की उन विरल विभूतियों में थे, जिन्होंने तीन पीढ़ियों के राजनीतिक जीवन को प्रभावित किया। सत्ता में रहे बिना भी उन्होंने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि राजनीतिक परिवर्तन की वास्तविक शुरुआत स्वयं से होती है। समाज में बदलाव लाने के लिए व्यक्ति को पहले अपने आचरण, विचार और जीवन-मूल्यों में परिवर्तन लाना चाहिए।
प्रो. विभु कुमार ने कहा कि जयप्रकाश नारायण कांग्रेस सरकार के गठन और स्वतंत्रता के बाद की राजनीतिक व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नेताओं में थे। बाद के वर्षों में उन्होंने सत्ता की राजनीति से अलग होकर जनशक्ति और लोकतांत्रिक मूल्यों को सर्वोपरि माना। वे युवाओं के हृदय सम्राट थे। उनके आह्वान पर युवाओं ने भ्रष्टाचार, अन्याय और निरंकुशता के विरुद्ध आवाज उठाई। संपूर्ण क्रांति का उनका विचार आज भी सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के लिए प्रासंगिक है।
किसी भी प्रकार की गुलामी को स्वीकार न करना ही वास्तविक आजादी है : प्रो. गजेंद्र कुमार
कार्यक्रम के दूसरे वक्ता प्रो. गजेंद्र कुमार, पूर्व संकायाध्यक्ष, मानविकी संकाय, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा ने अपने संबोधन में जयप्रकाश नारायण के स्वतंत्रता संबंधी विचारों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि जयप्रकाश नारायण के विचारों में किसी भी प्रकार की गुलामी को स्वीकार न करना ही वास्तविक आजादी है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल राजनीतिक पराधीनता से मुक्ति नहीं है, बल्कि व्यक्ति को सामाजिक, आर्थिक और मानसिक बंधनों से भी मुक्त होना चाहिए। जयप्रकाश नारायण ऐसी व्यवस्था के समर्थक थे, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान, स्वतंत्रता और विकास के समान अवसर प्राप्त हों। उनके विचार आज भी लोकतांत्रिक समाज के निर्माण और नागरिक चेतना को सशक्त बनाने की प्रेरणा देते हैं।
राजनीति नहीं, लोकनीति के समर्थक थे जयप्रकाश नारायण : कुलपति
जयप्रकाश नारायण राजनीतिज्ञ नहीं, राजनीति को दिशा देने वाले दार्शनिक थे : कुलपति
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा के कुलपति प्रो. परमेंद्र कुमार बाजपेयी ने कहा कि जयप्रकाश नारायण जन्मजात विद्रोही थे। अन्याय, शोषण और असमानता के प्रति उनका विरोध उनके व्यक्तित्व का मूल आधार था। उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन में स्थापित राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्थाओं की उन विसंगतियों को चुनौती दी, जो आम जनता के अधिकारों और स्वतंत्रता को बाधित करती थीं।कुलपति महोदय ने कहा कि जयप्रकाश नारायण राजनीति के स्थान पर लोकनीति के समर्थक थे। उनके लिए राजनीति का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि जनता की सेवा और समाज का कल्याण करना था। वे ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था चाहते थे, जिसमें जनता की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित हो तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया में सामान्य नागरिकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो। उन्होंने कहा कि जयप्रकाश नारायण ग्रामीण समुदायों के स्वतंत्र विकास के प्रबल समर्थक थे। उनका विश्वास था कि ग्राम स्वराज, विकेंद्रीकरण और स्थानीय समुदायों की आत्मनिर्भरता के माध्यम से ही लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाया जा सकता है। वर्तमान समय में उनके विचारों की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर युवाओं और विद्यार्थियों को लोकतांत्रिक मूल्यों, नैतिकता तथा सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए।
कार्यक्रम का विषय-प्रवर्तन जयप्रकाश अध्ययन केंद्र के सहायक निदेशक डॉ. रितेश्वर नाथ तिवारी ने किया। उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जीवन, विचारों और संपूर्ण क्रांति के दर्शन की ऐतिहासिक महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि जयप्रकाश नारायण भारतीय लोकतंत्र के ऐसे महान चिंतक और जननेता थे, जिन्होंने सत्ता से अधिक समाज और व्यक्ति की स्वतंत्रता को महत्व दिया। उनके विचारों का अध्ययन आज की पीढ़ी को लोकतांत्रिक चेतना, नैतिक मूल्यों और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को समझने में सहायता प्रदान करता है। कार्यक्रम का संचालन प्रो. हरिश्चंद्र, समन्वयक, राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS), जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा ने किया। उन्होंने अपने संचालन के माध्यम से लोकनायक के जीवन और विचारों की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए कार्यक्रम को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया।
धन्यवाद ज्ञापन इतिहास विभाग, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा के डॉ. अभय कुमार सिंह ने किया। उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित कुलपति, वक्ताओं, शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा विश्वविद्यालय के कर्मचारियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थियों की रही सहभागिता
इस अवसर पर प्रो. आर. के. श्रीवास्तव, प्रो. सरफराज अहमद, प्रो. अजीत तिवारी, प्रो. सुधील श्रीवास्तव, प्रो. अमरनाथ, डॉ. रजनीश कुमार यादव सहित विश्वविद्यालय के अनेक शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में वक्ताओं ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के विचारों को वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक संदर्भों में प्रासंगिक बताते हुए उनके आदर्शों को आत्मसात करने का आह्वान किया। व्याख्यान ने उपस्थित लोगों को लोकतंत्र, नैतिकता, जनभागीदारी और सामाजिक परिवर्तन के प्रति लोकनायक की प्रतिबद्धता को समझने का अवसर प्रदान किया।

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