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| हाईकोर्ट के अनुभवी अधिवक्ताओं को अपेक्षित जिम्मेदारी नहीं मिलने से उठे सवाल, स्टैंडिंग काउंसिल पद पर अवधेश पाण्डेय ने जताई असहमति: |
छपरा, 12 सितंबर।
बिहार सरकार की ओर से पटना हाईकोर्ट में सरकारी अधिवक्ताओं के नए पैनल के गठन के बाद अधिवक्ता जगत में असंतोष के स्वर मुखर होने लगे हैं। पैनल में वरिष्ठता, विधिक अनुभव, न्यायालय में स्वतंत्र रूप से बहस करने की क्षमता और पेशेवर दक्षता को पर्याप्त महत्व को नहीं दिए जाने को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। अधिवक्ताओं के एक वर्ग का आरोप है कि लंबे न्यायिक अनुभव और प्रभावी प्रैक्टिस वाले अधिवक्ताओं की अपेक्षा कुछ अन्य अधिवक्ताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दिए जाने से चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा है। अधिवक्ता समुदाय में चर्चा है कि सरकार की ओर से न्यायालय में पैरवी के लिए गठित पैनल महज नामों की सूची नहीं, बल्कि राज्य के महत्वपूर्ण मुकदमों की जिम्मेदारी संभालने वाली कानूनी टीम होती है। ऐसे में पद और जिम्मेदारी का निर्धारण अधिवक्ता की योग्यता, वरिष्ठता, अनुभव और हाईकोर्ट में स्वतंत्र रूप से मुकदमों की पैरवी करने की क्षमता के अनुरूप होना चाहिए।
इसी बीच हाईकोर्ट के वरीय अधिवक्ता अवधेश कुमार पाण्डेय का मामला विशेष रूप से चर्चा में आ गया है। उन्होंने स्टैंडिंग काउंसिल के पद पर योगदान करने में असमर्थता जताते हुए महाधिवक्ता को पत्र लिखा है। पत्र के अनुसार, वह करीब 15 वर्ष पूर्व बिहार सरकार के राजकीय अधिवक्ता के रूप में पटना हाईकोर्ट में लगभग आठ वर्षों तक सेवा दे चुके हैं। उनका कहना है कि उन्होंने स्टैंडिंग काउंसिल के पद के लिए सहमति नहीं दी थी, बल्कि एडिशनल एडवोकेट जनरल के पद के लिए अपनी सहमति व्यक्त की थी। इसके बावजूद उन्हें स्टैंडिंग काउंसिल नियुक्त किया गया। इसी कारण उन्होंने वर्तमान पद पर योगदान करने से असमर्थता जताई है। अवधेश कुमार पाण्डेय लंबे समय से हाईकोर्ट में प्रैक्टिस के साथ संगठनात्मक गतिविधियों से भी जुड़े रहे हैं। वह बिहार भाजपा विधि प्रकोष्ठ के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं और वर्तमान में विधि प्रकोष्ठ के प्रभारी हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि इतने लंबे विधिक अनुभव और संगठनात्मक योगदान के बावजूद उन्हें अब तक अपेक्षित जिम्मेदारी नहीं मिल सकी। अब जो पद दिया गया है, वह भी उनकी ओर से व्यक्त की गई सहमति और अपेक्षित जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं है।
पैनल गठन को लेकर सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी उठाया गया है। अधिवक्ता समुदाय के एक वर्ग का कहना है कि सरकारी अधिवक्ताओं के चयन में योग्यता और वरिष्ठता सर्वोच्च आधार होने के साथ- साथ समाज के विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों का संतुलित प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यदि अनुभवी और योग्य अधिवक्ताओं की उपेक्षा की धारणा मजबूत होती है तो इससे चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ सकता है। अधिवक्ताओं का कहना है कि सरकार के महत्वपूर्ण मुकदमों की पैरवी कमजोर हुई तो उसका सीधा प्रभाव राज्य के हितों पर पड़ेगा। इसलिए पैनल की समीक्षा की स्थिति में वरिष्ठता, अनुभव, विधिक दक्षता, स्वतंत्र बहस की क्षमता और संबंधित पद के अनुरूप योग्यता को स्पष्ट एवं प्रमुख आधार बनाया जाना चाहिए। फिलहाल, वरीय अधिवक्ता अवधेश कुमार पाण्डेय द्वारा स्टैंडिंग काउंसिल पद पर योगदान से इनकार किए जाने के बाद सरकारी अधिवक्ताओं के पैनल को लेकर उठे सवालों ने बहस को और तेज कर दिया है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार और महाधिवक्ता कार्यालय इस पूरे मामले पर क्या रुख अपनाते हैं।



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